Racism-Gora-kala-bhedbhav-aur-islam-Towards-Mukti-SLAM-hindu-dharm-Jeevan-Ka-Uddeshya-Aur-Muktimarg-Vigyan-Aur-Dharm-Ki-Raushni-Mein
विषय:
1. रंगभेद के खिलाफ पैगम्बर ए इस्लाम ने 1400 साल पहले उठाया था कदम
2. इस्लाम में है अमेरिकी रंग-भेद की समस्या का समाधान
3. पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाएं
4. पैगंबर मुहम्मद साहब की जीवनी
5.  रंगभेद के बारे में इस्लाम क्या कहता है Kala Gora Bhedbhav in Islam.

Kala Gora Bhedbhav in Islam

6. पैगंबर मुहम्मद साहब रंगभेद और जातिवाद के बारे में
7. पैगंबर मुहम्मद साहब और एक वृद्धि औरत का वाकया
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रंगभेद के खिलाफ पैगम्बर ए इस्लाम ने 1400 साल पहले उठाया था कदम
1958 में बेल्जियम में एक इन्सानी चिडिया घर था, जहाँ अपने से तहज़ीब याफ़ता किसी को न समझने वाले गोरे बेचारे स्याह रंग बच्चों और बड़ों को इस तरह खाना देते थे जैसे जानवरों को दिया जाता है…।

अब आप एक बात बताएं… इस्लाम ने तो चौदह सौ चालीस साल पहले ही स्याह रंग वालों को गले से लगा लिया था 

आज अक्सर मिडिया इस्लाम को ऐसे मजहब बना के लोगों  में पेश कर रही है  जिससे इस्लाम को कोई सरोकार ही नहीं है, इस्लाम का वो चेहरा दुनिया के सामने बनाने वालों! मैं दावे से कहता हूँ जिस दिन इस्लाम को समझ जाओगे उस दिन “ला ईलाहा इल्लल्लाह मुहम्मादुर्र रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वआलेही वसल्लम” का हक़ बयान करते हुए नज़र आओगे, इन्शाअल्लाह…।

चलो तुम्हें चौदह सौ चालीस साल पहले का एक वाक़िया बता देता हूँ, जिससे ये जानने में आसानी हो जाएगी कि इस्लाम की शिक्षा क्या है स्याह रंग वालों के लिए भी…।

ऐलान नबुव्वत (ज़ाहिरी तौर) के चंद रोज़ बाद आप हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम एक रात मक्का की एक गली से गुज़र रहे थे कि उन्हें एक घर में से किसी के रोने की आवाज़ आई…।

आवाज़ में इतना दर्द था कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम बेइख़्तयार उस घर में दाख़िल हो गए… देखा तो एक नौजवान जो कि बहोत स्याह और देखने में हब्शा का मालूम होता है, चक्की पीस रहा है और ज़ारो क़तार रो रहा है…। 
आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने उससे रोने की वजह पूछी तो उसने बताया कि मैं एक ग़ुलाम हूँ… सारा दिन अपने मालिक की बकरियाँ चराता हूँ, शाम को थक कर जब घर आता हूँ तो मेरा मालिक मुझे गंदुम (अनाज) की एक बोरी पीसने के लिए दे देता है जिसको पीसने में सारी रात लग जाती है…। मैं अपनी क़िस्मत पर रो रहा हूँ कि मेरी भी क्या क़िस्मत है मैं भी तो एक गोश्त पोस्त का इंसान हूँ…।

मेरा जिस्म भी आराम मांगता है… मुझे भी नींद सताती है लेकिन मेरे मालिक को मुझ पर ज़रा भी तरस नहीं आता…। क्या मेरे मुक़द्दर में सारी उम्र इसी तरह रो-रो के ज़िंदगी गुज़ारना लिखा है..? आप रहमत-ए-आलम नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं तुम्हारे मालिक से कह कर तुम्हारी मशक़्क़त तो कम नहीं करवा सकता क्योंकि वो मेरी बात नहीं मानेगा… हाँ मैं तुम्हारी थोड़ी मदद कर सकता हूँ कि तुम सो जाओ और मैं तुम्हारी जगह पर चक्की पीसता हूँ…। वो ग़ुलाम बहुत ख़ुश हुआ और शुक्रिया अदा करके सो गया… और आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम उसकी जगह चक्की पीसते रहे… जब गंदुम (अनाज) ख़त्म हो गई तो आप उसे जगाए बग़ैर वापस तशरीफ़ ले आए…।

दूसरे दिन फिर आप वहां तशरीफ़ ले गए और उस ग़ुलाम को सुला कर उसकी जगह चक्की पीसते रहे…। तीसरे दिन भी यही माजरा हुआ कि आप उस ग़ुलाम की जगह सारी रात चक्की पीसते और सुबह को ख़ामोशी से अपने घर तशरीफ़ ले आए…। चौथी रात जब आप वहाँ गए तो उस ग़ुलाम ने कहा…

ऐ अल्लाह के बंदे! आप कौन हो…? और मेरा इतना ख़्याल क्यों कर रहे हो…? हम गुलामों से न किसी को कोई डर होता है और न कोई फ़ायदा… तो फिर आप ये सब कुछ किस लिए कर रहे हो…? आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं ये सब इंसानी हमदर्दी के तहत कर रहा हूँ इस के इलावा मुझे तुम से कोई ग़रज़ नहीं…। उस ग़ुलाम ने कहा कि आप कौन हो…? आप नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया… क्या तुम्हें इल्म है कि मक्का में एक शख़्स ने नुबुव्वत का दावा किया है..? उस ग़ुलाम ने कहा हाँ मैंने सुना है कि एक शख़्स जिस का नाम मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम) है अपने आप को अल्लाह का नबी कहता है…। 

आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने फ़रमाया कि…
मैं वही मुहम्मद हूँ…। ये सुन कर उस ग़ुलाम ने कहा कि अगर आप ही वो नबी हैं तो मुझे अपना कलिमा पढ़ाईए क्योंकि इतना शफ़ीक़ और मेहरबान कोई नबी ही हो सकता है, जो गुलामों का भी इस क़दर ख़्याल रखे…। आप सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही व सल्लम ने उन्हें कलिमा पढ़ा कर मुसलमान कर दिया…।

फिर सारी दुनिया ने देखा कि उस ग़ुलाम ने तकलीफ़ें और मशक़्क़तें बर्दाश्त की लेकिन दामन-ए-मुस्तफा न छोड़ा…। उन्हें जान देना तो गवारा था लेकिन इतने शफ़ीक़ और मेहरबान नबी का साथ छोड़ना गवारा न था…। आज सारी दुनिया उन्हें हज़रत बिलाल-ए-हब्शी रज़िअल्लाहु तआला अन्हु के नाम से जानती है…। नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हमदर्दी और मुहब्बत ने उन्हें आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का बे लौस ग़ुलाम बना कर रहती दुनिया तक मिसाल बना दिया…। - लेखक: तनवीर त्यागी
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पैगम्बर मुहम्मद ﷺ का ऐसा सुलूक देखकर एक बुढ़िया इस्लाम धर्म स्वीकार कर ली 
एक बूढ़ी औरत थी जो मक्का मैं उस दौर में रहती थी जब रसूलुल्लाह हजरत मुहम्मद सल्लाहू अलैही वसलम्म ने लोगों को इस्लाम की बातें बतानी शुरु की। उस बूढ़ी औरत को लोगों ने कहा यह कोई जादूगर है , उससे दूर रहना क्यूँकी वो जिससे बात करता है या जो उससे मिलता है वो उसकी बातों में आ जाता हैं और इस्लाम को अपना धर्म मान लेता हैं।

वो औरत इस बात से डर गई। उस बूढ़ी औरत ने मक्का छोड़ने का इरादा कर लिया। उसने अपना सारा सामान लिया और वो अब सफर पर निकल पड़ी। सामान ज्यादा था , वजनी थी और औरत थी बूढ़ी। वह बहुत मुश्किल से चल पा रही थी। उसे रास्ते में एक बहुत ही खुबसूरत शख्स मिला जिसने उसका सारा सामान उठा लिया। उस शख्स ने उस बूढ़ी औरत से कहा कि आपको कहा जाना मुझे बता दो। उस बूढ़ी औरत ने जगह का पता दे दिया। रास्ते में वह बूढ़ी औरत कहती हुई जा रही थी कि एक शख्स मक्के में है। वह जादूगर है और लोगो को गुमराह कर रहा हैं। इसलिए ही वह उस शख्स से कही दूर जा रही हैं।

जब वह बूढ़ी औरत उसकी मंजिल पक पहुँच गई तो उस खूबसुरत शख्स से पूछा कि बेटा तुमने अपना नाम नहीं बताया ? कौन हो और कहा के रहने वालों हो तुम ? उस खुबसूरत शख्स ने जवाब दिया कि में वही मुहम्मद हूँ जिसके बारे में तुं रास्ते में बाते करती हुई आ रही थी। जिससे तुम दूर जाना चाह रही थी वह में हूँ। उस औरत ये सब बात सुनकर ताज्जुब हुआ। उस बूढ़ी औरत ने पूछा कि तुम सबकुछ जानते हुई भी मुझे मंजिल पर पहुँचा दिया और मेरी मदद क्यू की।

हजरत मुहम्मद ﷺ ने कहा कि अल्लाह का हुक्म है कि कमजोर , बुढ़ो और मजदूरो की मदद करो। इससे कोई फर्क नही पड़ता कि वो किस धर्म को मानने वाला हैं। उस बूढ़ी औरत ने हजरत मुहम्मद सल्लाहू अलैहि वसल्लम का हुस्ने सुलूक देखकर चौंक गई। उस बूढ़ी औरत ने कहा कि अगर आप ही मुहम्मद सल्लाहू अलैहि वसल्लम है तो में आप पर ईमान लाती हूँ। गोय़ा जिस मजहब़ के कानून इतने अच्छे हो उसका पैगाम पहुँचाने वाला जादूगर और झूठा हो ही नही सकता। सुब्हानअल्लाह।
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पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब की सहनशीलता पुरे विश्व के लिए सीख का मार्ग है
पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब जिस रास्ते से गुजरते थे उस पर रोजाना एक बुढ़िया कूड़े फेंक देती थी 
आप खुद पर पड़े कूड़े को साफ़ करके आगे निकल जाते थे,ये सिलसिला कई रोज़ चला ,एक रोज़ कूड़ा ऊपर से नही फेंका गया ,दूसरे रोज़ भी ,तो पैगम्बर साहब ने अपने अनुयायियों से पूछा की वो बूढी औरत कहाँ है,लोगों ने बताया की वो बीमार है !

आप तुरंत उसका हाल चाल लेने उसके घर जा पहुचे, बुढ़िया आपको देख कर घबराई और कहने लगी आज जब मैं बीमार हूँ, कमज़ोर हूँ तो तुम मुझसे बदला लेने आये हो, पैगम्बर साहब ने इतना सुनते ही  कहा 'नही ,मैं तो आपकी  मिजाजपुर्सी के लिए आया हूँ, ये देखने आया हूँ की अब आप ठीक हो! यह सुनना था और उस  बूढी महिला ने पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब से माफ़ी मांगी और अल्लाह पर ईमान ले आई और मुस्लमान हो गई! इस कथा से साफ साफ मालूम हो जाता है  इस्लाम लोगों से मोहब्बत करना सिखाता है नफरत करना मुसलमानों का धर्म नही, पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब की  सहनशीलता पुरे विश्व के लिए सीख का मार्ग है।